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दृढ़ निश्चय का फल (Success of Your Determination

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“हां-हां, जरूर खरीदना। अब मैं जल्दी से जाकर वह रुपया निकाल लाता हूं। तुम तैयार हो जाओ, हम आज ही मेला देखने चलेंगे।”

फिर रामसिंह राजमहल के पिछवाड़े वाली दीवार से रुपया निकालने चल दिया। उस रुपए को रामसिंह अपने लिए बड़ा भाग्यशाली समझ रहा था। उसी की बदौलत उसकी शादी लाली से हुई थी। उसके लिए तो सारी दुनिया की दौलत एक तरफ और वह रुपए एक तरफ था।

रामसिंह तेजी से पुराने महल की ओर भागा जा रहा था। वह जिस सड़क पर भागा जा रहा था, वह जंगल में स्थित पुराने महल से जा मिलती थी। रास्ते में एक ओर नया राजमहल था। जिस समय रामसिंह भागा जा रहा था, उसी समय महाराज महल की छत पर खड़े अपने मंत्रियों से मंत्रणा कर रहे थे। अचानक उनकी नजर रामसिंह पर पड़ी। वह यह देखकर हैरान हुए कि पसीने से तर-बतर यह युवक भरी दोपहरी में कहां भागा जा रहा है- वह भी जंगल वाले रास्ते पर।

“मंत्रीजी!”
“जी महाराज!”
“इस युवक को देख रहे हो जो भरी दोपहर में पसीने से तर-बतर जंगल की ओर भागा जा रहा है।”

“देख रहा हूं महाराज!”

“इसे फौरन पकड़वाकर हमारे सामने पेश कीजिए। जंगल की ओर भागे जाने का इसका अवश्य ही कोई खास मकसद है। हम जानना चाहते हैं कि यह बदहवास-सा क्यों और कहां भागा जा रहा है। अपनी प्रजा के सुख-दुख का ख्याल रखना हमारा कर्तव्य है।”

“जो आज्ञा महाराज।”

मंत्री ने तुरंत सिपाहियों को आदेश दिया। कुछ ही देर बाद सिपाहियों ने रामसिंह को पकड़कर महाराज के सामने उपस्थित कर दिया। डरा हुआ रामसिंह हाथ जोड़े राजा के सामने खड़ा था।

“युवक! तुम कौन हो और इस प्रकार चिलचिलाती धूप में बेतहाशा कहां भागे जा रहे थे?”

“महाराज! मेरा नाम रामसिंह मसकी है। मैं एक बड़े ही आवश्यक कार्य से जा रहा था।”

“वह आवश्यक कार्य क्या है जिसके आगे तुम्हें धूप-छांव की भी परवाह नहीं है।”

“महाराज! दरअसल बात यह है कि पुराने महल के पिछवाड़े वाली दीवार में मैंने अपना धन छिपा रखा है। आज अपनी पत्नी को मेला घुमाने के लिए मैं अपना वही धन निकालने जा रहा हूं।”

“धन?” महाराज चौंके।
“जी महाराज!”
“तुम्हारे पास कितना धन है जो तुम इस कदर भागे जा रहे हो?” महाराज ने हैरानी से पूछा- “क्या दस-पांच हजार मोहरें है?”

“नहीं महाराज!”
“हजार-दो हजार।”
“इतना भी नहीं महाराज!” रामसिंह बोला- “मेरा धन तो सिर्फ चांदी का एक सिक्का है।”

“क्या?” महाराज पुन: चौंके- “केवल चांदी का एक सिक्का?”
“जी महाराज! वही मेरा खजाना है जिसे मैंने काफी दिनों से संजोकर रखा हुआ है।”

महाराज हैरानी से रामसिंह का चेहरा देखे जा रहे थे। रामसिंह का भोलापन देखकर उन्हें उस पर तरस आने लगा था।

जबकि रामसिंह कह रहा था- “उस एक सिक्के से ही मैं अपनी पत्नी को मेला दिखाकर खुश कर दूंगा। मेरी पत्नी के सिवा मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है महाराज!”

“यदि ऐसी बात है तो हम तुम्हें अपने खजाने से चांदी का एक सिक्का दिला देते हैं। उसे लेकर तुम घर जाओ और अपनी पत्नी के साथ मेला देख आओ। एक सिक्के के लिए इस चिलचिलाती धूप में दौड़ने से क्या फायदा?”

“महाराज! आज आप मुझ पर मेहरबानी करके मुझे एक रुपया दे रहे हैं, यह तो बड़ी खुशी की बात है। मगर फिर भी मैं अपना वह रुपया लेने अवश्य जाऊंगा। वह रुपया मेरे लिए बड़ा भाग्यशाली हैं।”

“देखो रामसिंह! इस तपती दोपहरी में जंगल की ओर जाने का विचार त्याग दो। तुम हमारी प्रजा हो और हम राजा। अपनी प्रजा के सुख-दुख का ख्याल रखना हमारा कर्तव्य है। तुम्हें चांदी का एक सिक्का कम लगता है, तो हम दो सिक्के दिलवा देते हैं।

“आप हमारे अन्नदाता हैं महाराज! आप कृपा करके जो भी देंगे, मैं सहर्ष स्वीकार कर लूंगा-किंतु… ।”

“किंतु क्या?”
“मैं अपना वह रुपया लेने जंगल अवश्य जाऊंगा।”
“यदि हम तुम्हें सौ मोहरें दे तो क्या तब भी… ?”
“हां महाराज! तब भी।”
“अजीब देखो बेवकूफ और जिद्दी युवक है। सौ मोहरें लेकर भी अपना एक सिक्का छोड़ने को तैयार नहीं। आखिर ऐसी क्या विशेषता है उस सिक्के में।” सोचते हुए महाराज ने पूछा- “अरे युवक! तेरे उस सिक्के की क्या विशेषता है जो सौ मोहरों के बदले भी तु उसका मोह छोड़ने को तैयार नहीं।”

“महाराज मैं बता चुका हूं कि यहां मेरे लिए वह सिक्का बड़ा ही भाग्यशाली है। यदि मुझे वह सिक्का ना मिला होता तो मेरी शादी भी नहीं हुई होती। यदि मैं शादी न करता तो मुझे लाली जैसी सुंदर और सुशील पत्नी भी नहीं मिली होती। इसलिए महाराज! वह रुपया मेरे लिए बहुत कीमती है।”

महाराज ने सोचा- ‘यह युवक धुन का पक्का है, मगर इमानदार है या लालची, इसके लिए इसकी परीक्षा लेनी चाहिए।’ अत: वह बोले- “रामसिंह! यदि हम तुम्हें हजार मोहरें दें, तो क्या तुम क्या तब भी तुम उस रुपए को लेने जाओगे।?”

“हां महाराज! उस रुपए को तो मैं अवश्य लेने जाऊंगा। क्योंकि वह रुपया मैंने अपनी पत्नी पर ही खर्च करने का निर्णय लेकर छुपाया था। अब उसी रुपये से में उसे मेला घुमाऊंगा।”
“मगर जब हम तुम्हें उस रुपए से हजार गुना अधिक धन दे रहे हैं, तो तुम उस रुपए का लालच क्यों नहीं देते?”

“क्षमा करें महाराज! यदि मैं अधिक धन के लालच में उस रुपए का मोह छोड़ दूंगा, तो जीवन भर मेरी आत्मा पर एक बोझ-सा बना रहेगा।”

कहते हैं तीन हठ बहुत बुरी होती हैं- राजहठ, बालहठ और योगहठ।
जहां रामसिंह अपने बालहठ पर कायम था कि पत्नी को उसी रुपये से मेला दिखाऊंगा, वहीं महाराज के मन में भी राजहठ की भावना उत्पन्न हो गई थी कि चाहे जो भी हो, चाहे कितनी भी भारी कीमत क्यों न चुकानी पड़े, इस युवक को वह रुपया लेने नहीं जाने दूंगा। यह सोचकर वह बोले- “देखो रामसिंह! यह हमारी हठ है कि हम तुम्हें वह रुपया लेने नहीं जाने देंगे। इसके बदले हमें भले ही कितने भी भारी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। उस रुपए के बदले, हम तुम्हें मुंहमांगी दौलत देने को तैयार हैं।”

“दौलत इंसान की बुद्धि भ्रष्ट कर देती है महाराज! मैं तो मेहनतकश इंसान हूं, हम लोगों को तो पेट भरने लायक धन मिल जाए, वही बहुत है। आपकी भाई-से-भारी दौलत भी मुझे वो खुशी नहीं दे सकती, जो खुशी मुझे उस रुपए को पाकर प्राप्त होगी।”

“हम तुम्हारे विचार जानकर बहुत खुश हुए रामसिंह। तुम लालची नहीं हो तुम जैसे नौजवान जिस राज्य में हों, वह राज्य अवश्य ही उन्नति करता है। हम खुश होकर तुम्हें अपने राज्य का आधा भाग इनाम में देते हैं। मगर शर्त हमारी वही है कि तुम वह रुपया लेने नहीं जाओगे।”

“ओह!”
रामसिंह समझ गया कि महाराज जिद पर अड़ गए हैं। यदि उसने उस रुपए कोई लाने की जिद नहीं छोड़ी तो उसे इनाम के बदले दण्ड भी दिया जा सकता है। अतः अब तो बेहतरी इसी में है कि कोई ऐसी युक्ति लड़ानी चाहिए कि महाराज का कोप‌‌-भाजन भी न बनना पड़े और वह रुपया भी मिल जाए। अतः वह बोला‌-“महाराज! आपकी आज्ञा सिर माथे पर, किंतु आप मुझे राज्य का वही हिस्सा दें जो मैं चाहता हूं।”

“शाबाश! यह हुई न कोई बात। प्रजा को सदा अपने राजा की आज्ञा का पालन करना चाहिए। बोलो, तुम्हें हमारे राज्य का कौन-सा हिस्सा स्वीकार है। हम वचन देते हैं, तुम्हें वही हिस्सा दिया जाएगा।”
“मुझे उतरी हिस्सा चाहिए महाराज!”
“ओह रामसिंह!! तुम सचमुच बहुत बुद्धिमान हो। अपने बुद्धिबल से तुमने हमारा आदेश मानकर हमें भी संतुष्ट कर दिया और अपना वह रुपया भी प्राप्त कर लिया। क्योंकि उत्तरी हिस्से में ही वह पुराना महल है जिसमें तुमने अपना एक रुपया छुपा रखा है। तुम बुद्धिमान ही नहीं, दृढ़ निश्चय भी हो। तुम जैसे युवक सदैव उन्नति करते हैं। हमें गर्व है कि तुम जैसा होनहार युवक हमारे राज्य में पैदा हुआ।”

“और वह भाग्यशाली रुपया भी महाराज! जिसके कारण मैंने आपकी खुशी से आपके राज्य का आधा हिस्सा भी पा लिया। अब आप ही बताएं कि मैं उस भाग्यशाली रुपए का मोह कैसे छोड़ सकता हूं।”

रामसिंह के दृढ़ निश्चय और बुद्धिमता के समक्ष नतमस्तक हो गए। उसी दिन रामसिंह को राज्य का आधा हिस्सा देकर वहां का राजा बना दिया गया। राजा बनते ही रामसिंह ने सबसे पहले पुराने महल की दीवार से अपना वह रुपया प्राप्त किया और उसे चुमकर माथे से लगाकर बोला- “तुम बहुत शुभ हो। तुम्हारे कारण ही मेरे नसीब जाग गए मित्र! यदि तुम मुझे न मिलते तो न सुंदर और सुशील पत्नी मिलती और न ही राज्य।”


कहानी की प्रेरक बातें-

किसी ने सत्य ही कहा है- धुन के पक्के और दृढ़ निश्चय मनुष्य उम्मीद से अधिक पा लेते हैं, लेकिन प्राप्त किया जाने वाला लक्ष्य शुभ एवं निस्वार्थ हो।

इसका एक सरल सा उदाहरण हम sir Elon Musk के जीवन को लेकर देख सकते हैं। SpaceX और Tesla Motors के संस्थापक जिन्होंने न जाने कितनी ही बार असफलता प्राप्त किया वह भी लगातार फिर भी वे अटल रहे और दृढ़ निश्चय गुण की वजह से ही वे आज दुनिया के दूसरे सबसे अमीर और सबसे सफल व्यक्ति बन पाए।

दृढ़ निश्चय एक ऐसी शक्ति है
जिसका कोई तोड़ नहीं है।


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दृढ़ निश्चय का फल | Success of Your Determination

रामसिहं मशकी शहर में मशहूर था। वह गंगा नदी के तट पर ही अपनी बिरादरी के साथ रहता था। उसका काम सुबह-सुबह गंगा नदी से अपने मशक में पानी भरना और धनवान लोगों के घरों तक पहुंचाना था।

एक दिन रामसिंह सुबह-सुबह मसक उठाए बस्ती की ओर बढ़ा जा रहा था कि अचानक उसकी नजरें धरती पर पड़े चांदी के एक रुपये पर पड़ी।

“अरे वाह! सुबह-सुबह चांदी का रुपया। हे मां लक्ष्मी! आज तो तुमने मुझ गरीब पर बड़ी कृपा की।”

राम सिंह का खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन अगले ही पल वह सोच में डूब गया। समस्या यह थी कि अब उस रुपये को रखे कहां? उसकी झोपड़ी तो सुरक्षित नहीं थी क्योंकि उसमें दरवाजा नहीं था। बस एक पर्दा-सा द्वार पर लटका रहता था।

“हे प्रभु! इस रुपए को कहां रखूं जो यह सुरक्षित रह सके। इस रुपए को तो मैं किसी खास मौके पर ही खर्च करना चाहता हूं, मगर तब तक इसकी सार-संभाल कैसे करूं?” रामसिंह चिंता में डूब गया।

अभी रामसिंह की शादी नहीं हुई थी। उसके मन में आया क्यों न मैं ही यह रुपया कहीं छिपाकर रख दूं और अपनी शादी पर इसे खर्च करुं। शादी के बाद इससे अपनी पत्नी को श्रृंगार का सामान लाकर दूंगा तो वह बहुत खुश होगी। यह निर्णय रामसिहं ने कर लिया कि वह इस रुपये का क्या करेगा, लेकिन पहले वाली समस्या जस की तस थी कि इस रुपए को कहां रखा जाए।

अचानक उसके मन में ख्याल आया कि क्यों ना मैं इस रुपए को पुराने राजमहल के पिछवाड़े वाली दीवार में कहीं छुपा दूं। वहां कोई आता-जाता भी नहीं है। यही सोचकर रामसिंह महल की ओर चल दिया।

पुराना महल नगर से काफी दूर था और वहां अब आबादी भी नहीं थी। रामसिंह महल के पिछवाड़े पहुंचा, वहां एक जगह से दीवार थोड़ी टूटी हुई थी। राम सिंह ने एक-दो ईंटें हटाईं और अपने पतके (सिर पर बांधने वाले कपड़े) में से थोड़ा-सा कपड़ा फाड़कर रुपया उसमें लपेटकर एक सुराख में रख दिया। फिर जो ईंटें हटाईं थीं, उन्हें वैसे ही लगा दिया ताकि कपड़े की पोटली किसी को दिखाई न दे।

“हां, अब ठीक है। यहां रुपया सुरक्षित है‌- न तो चोरी का डर और न ही आंधी-तूफान का खतरा।”

रामसिंह चांदी का एक रुपया पाकर स्वयं को काफी अमीर समझ रहा था। अब रामसिंह को अपनी शादी का इंतजार था कि कब उसकी शादी हो और कब वह उस रुपये को निकालकर खर्च करे।

अचानक रामसिंह की आंखों के सामने उसकी बिरादरी के सीताराम की बेटी लाली का चेहरा थिरकने लगा। वह लाली को मन-ही-मन चाहता था और उससे शादी भी करना चाहता था। मगर सीता काका से बात करने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसने सोचा कि क्यों ना लालाराम पंसारी की मार्फत बात आगे बढ़ाई जाए। यह ख्याल मन में आती ही वह उल्टे पैर लालाराम पंसारी की दुकान की ओर चल दिया।

“राम-राम लाला जी।”

“अरे रामसिंह! भई, आज सुबह-सुबह यहां कैसे? काम-धंधे पर नहीं गए क्या?”

“क्या बताऊं लालाजी! घर के चौका-बर्तन से फुर्सत मिले तो काम-धंधे की बात सोचूं। अब तो मन में आता है कि तुम्हारा कहा मान ही लूं। चौका-बर्तन से फुर्सत मिल जाएगी तो मन लगाकर काम भी करुंगा।”

“मेरी बात… ।” लाला चौंका‌ “मेरी कौन-सी बात?”

“अरे वही, शादी की बात। तुमने कहा नहीं था कि अब तुझे शादी कर लेनी चाहिए।”

“अच्छा-अच्छा शादी। अगर तू हां करें तो सीता राम काका से आज ही बात करुं। कई बार कह चुके हैं कि लाला कोई अच्छा-सा और मेहनती लड़का बताओ।”

“अरे तो मैं कौन-सा कम मेहनती हूं लाला जी। आप बात पक्की करवा दो तो मैं चट मंगनी और पट ब्याह कर लूं।”

और फिर लालाराम पंसारी ने सीताराम काका से बात करके उसकी बेटी लाली की शादी की बात रामसिहं से पक्की करवा दी। कुछ ही दिनों बाद दोनों की शादी भी हो गई।

शादी होकर लाली रामसिंह की झोपड़ी में आ गई।

दोनों पति-पत्नी खुशी-खुशी अपने दिन गुजारने लगे। शादी के बाद रामसिहं लाली के प्यार में ऐसा खो गया कि उसे चांदी के उस रुपये का ध्यान ही न रहा। वह तो बस काम पर जाता और जो दो-चार पैसे कमाकर लाता, वह लाली के हाथ पर रख देता।

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आषाढ़ के महीने में गंगा तट पर हर साल मेला लगा करता था। एक दिन लाली ने उसके गले में बाहें डालकर प्यार से कहा‌- “सुनो जी! क्या मुझे मेला घुमाने नहीं ले चलोगे?”

यह सुनकर रामसिंह घर से बाहर आ गया। वह चिंता में डूब गया कि आखिर लाली को मेला घुमाने के लिए पैसे कहां से आएंगे।
“अरे र र र!” अचानक रामसिंह खुशी से उछल पड़ा।

एकाएक उसे उस रुपए की याद आई जिसे शादी से कुछ ही दिन पहले वह पुराने राजमहल की दीवार में छिपा आया था। उस रुपये को पाकर ही तो उसके मन में शादी का विचार आया था लेकिन शादी के बाद गृहस्ती के चक्कर में वह उस रुपए को भूल ही गया था। वह तेजी से अपनी झोपड़ी में गया और लाली को गोद में भरकर खुशी से नाचने लगा।

“अरे…रे…यह क्या करते हो। छोड़ो मुझे। अभी तो मेला जाने के नाम पर तुम्हारी नानी मर गई थीं और अब ऐसे खुश हो रहे हो जैसे तुम्हारे हाथ कोई खजाना लग गया हो।”

“खजाना ही हाथ लग गया, समझ लो।” कहते हुए उसने लाली को नीचे उतार दिया और रुपये वाली पूरी बात बता दी।

“अरे वाह। चांदी के एक रुपये से तो हम काफी चीजें खरीद सकते हैं।” खुश होकर लाली बोली‌- “देखो जी! मैं तो अपने कानों के झुमके जरूर खरीदूंगी।”

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